Thursday, 27 January 2022

जाने कितने रूप धराये कितने ही अवतार लिये लिरिक्स कवि प्रहलाद सिंह कविया प्रांजल

 


जाने कितने रूप धराये ,कितने ही अवतार लिये 

जाने कितने दुष्ट दलन को , पापिन पर प्रहार किये

जाने कितनी शक्ती तेरी,  जाने कितने हाथ तेरे 

इस धरती में कण नहीं जितने, उतने परचे मात तेरे 

तूं शक्ती तूं भक्ती मैया ,तूं ही तो अनुरक्ती है 

तूं शिव संग बनी कैलाशी, तूं ही मात विरक्ति है 

तूं अंबर तूं सागर करणी, तूं जगत जणेता है 

तुझको पाकर मोक्ष मिले मां, तूं ही मात प्रणेता है 

तूं चंदन में खुशबू मैया ,रश्मी पुंज तूं दिनकर की 

तूं विश्वास तूं ही आसा मां, खुशियां है तूं घर घर की 

तूं प्राणों का धन भुजलंबे , तूं ही सार पुराणों का 

तूं ही खंग खनकती रण में, तूं ही वेग मां बाणों का 

तूं रणचंडी तूं ही दुर्गा ,तूं रखवाली जन जन की 

तूं संहार अरी का करणी, तूं ही मौत दशानन की 

तूं बलशाली तूं विकराली , काल तुम्हारी मुट्ठी में 

तूं सूरों का सत जगदंबे ,तूं ही आन अटूटी में

तूं जल में थल में महामाया, तुम ही नभ में छाती हो 

पातों की पीड़ा हरने ,तुम वेग अनल के आती हो 

तुमसे कौन बड़ा है करनी , धरनी तेरे चरणों में 

तूं ही राज करे त्रिभुवन में, तुम अक्षर तुम वर्णों में

तेरी भक्ती की शक्ति का , किसने पार भला पाया 

मंदिर मंदिर जौत तेरी , हर मूरत में तुम महामाया 

            प्रहलाद सिंह कविया

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